दुर्गा मानस पूजा

मानस-पूजा के नियम हिन्दुओं की पूजा का मुख्य ध्येय अपने स्वरूप- मन, बुद्धि, चित्त और ‘अहङ्कार’ को क्रमशः प्रकाशित करना है । अस्तित्व के विभिन्न स्तरों को देखते ही हिन्दुओं ने विविध भावना-मयी पूजन-विधियों की रचना की है । इन सबमें ‘मानस-पूजन’ सबसे उत्तम पूजन-विधि है । इसमें बाह्यत्व का सर्वथा अभाव रहता है तथा भावना के द्वारा ‘इष्ट-देव’ के स्मरण-रूपी प्रकाश से अपने मन, बुद्धि, चित्त और अहङ्कार को प्रकाश-मय किया जाता है । ‘मानस-पूजा’ में पूजा करनेवाला एक ओर अपने मन, बुद्धि, चित्त और अहङ्कार को विषय-वासना से हटाता है, तो दूसरी ओर पूर्ण श्रद्धा के साथ विशुद्ध भावना-मयी क्रियाओं द्वारा एकमात्र सत्य, प्रकाश-मय अपने इष्ट-देव’ का स्मरण करता है, जिससे देह, प्राण, मन, बुद्धि आदि की बाधाएँ क्रमशः दूर हो जाती हैं और अन्ततः चित्त में साक्षात् ‘इष्ट-देव’ आविर्भूत हो जाते हैं । यहाँ यह उल्लेखनीय है कि प्रत्येक जीव के लिए विषय-उपभोगार्थ पाँच प्रधान मार्ग प्रति-क्षण सुलभ हैं । इन्हें हम ‘पञ्च ज्ञानेन्द्रिय’ कहते हैं । यथा- (१) नेत्र, (२) कर्ण, (३) नासिका, (४) जिह्वा और (५) त्वचा । इन्हीं पञ्च- ज्ञानेन्द्रियों द्वारा मन, बुद्धि आदि अन्तःकरण विषयों का उपभोग करते हैं और अपने वास्तविक प्रकाश-मय स्वरूप से अनभिज्ञ रहते हैं । ‘मानस-पूजा’ में इन पञ्च-ज्ञानेन्द्रियों को अन्तर्मुखी भाव से ‘इष्ट-देव’ के दिव्य प्रकाश-मय स्वरूप के प्रति समर्पित किया जाता है, जिससे इनके द्वारा विषय-उपभोग-रूपी बाधा समाप्त हो जाती है । नेत्रों द्वारा ‘इष्ट-देव’ का ध्यान होने से नेत्रों की अन्य सांसारिक विषय देखने की लालसा समाप्त हो जाती है । इष्ट-देव की स्तुति, गायन के श्रवण से कर्णों की, ‘इष्ट-देव’ के प्रति समर्पित सुगन्धि से नासिका की, ‘इष्ट-देव’ के प्रति अर्पित नैवेद्य से जिह्वा की एवं ‘इष्ट-देव’ के स्नान, प्रदक्षिणा से त्वचा की अन्य विषय-भोग-रूपी बाधाएँ समाप्त हो जाती हैं । ऐसी सिद्धि-दायिनी ‘मानस-पूजा’ को कोई भी व्यक्ति किसी भी समय कर सकता है । किन्हीं विशेष नियमों का बन्धन भी नहीं है । केवल बाह्य विषयों से अपने चित्त को हटाकर स्वच्छ शरीर और मन से पूर्ण श्रद्धा के साथ ‘इष्ट-देव’ के प्रति समर्पण करना होता है । पूर्ण समर्पण के लिए सबसे पहले अपने हृदय में ‘इष्ट-देव’ के विशिष्ट स्वरूप को निर्दिष्ट ध्यान द्वारा प्रतिष्ठित करना होता है । फिर उस स्वरूप में मन-ही-मन उन्हें आमन्त्रित (आवाहन) किया जाता है । आमन्त्रण के बाद उन्हें सुख-पूर्वक विराजमान होने के लिए मानसिक भावना द्वारा भव्य मन्दिर, पालकी, सिंहासन, चॅदोवा आदि समर्पित किए जाते हैं । इस प्रकार जब इष्ट-देवता हृदय में स्थान ग्रहण कर लेते हैं, तब भावना द्वारा उनके चरण-कमलों को मन-ही-मन धोते हैं (पाद्य-समर्पण) । इसके बाद मानसिक भावना द्वारा इष्ट-देवता का अभिषेक (अर्घ्य-समर्पण) किया जाता है । उन्हें आचमन, मधुपर्क दिया जाता है । सुगन्धित तैल अर्पित किया जाता है । फिर विविध प्रकार से भावना द्वारा स्नान कराते हैं । स्नान के बाद वस्त्र, पादुका, विविध आभूषण आदि भावना द्वारा समर्पित करके पहले मानसिक पुष्पों से उनकी पूजा करते हैं । फिर भावना द्वारा ही धूप, आरती, तर्पण, नैवेद्य, आरती, दक्षिणा द्वारा उनकी विधि-वत् पूजा करते हैं । अत्यन्त सेवा-भाव से छत्र, दर्पण आदि दिए जाते हैं और उनकी विस्तृत आरती (नीराजन) की भावना की जाती है । नीराजन के बाद ‘इष्ट-देव’ के आनन्द के लिए मन-ही-मन विविध सुशोभित वाहन समर्पित करते हैं । पङ्खों से उन्हें शीतलता (व्यजन) प्रदान करते हैं । फिर मन से नृत्य, वाद्य, गायन द्वारा उन्हें प्रसन्न करते हैं । उनके चारों ओर प्रदक्षिणा करके उन्हें प्रणाम, पुष्पाञ्जलि समर्पित करते हैं । सबसे अन्त में हृदय में शयन हेतु उन्हें मनोहर पर्यङ्कादि से युक्त शयनागार समर्पित करते हुए प्रार्थना करते हैं कि विश्राम करते समय भी ‘इष्ट-देवता’ अपने भक्त के प्रति कृपा-भाव बनाए रखें । ‘मानस-पूजा’ का उक्त विधान सरल होते हुए भी कितना प्रभावी है, इसका अनुभव केवल वही साधक कर सकते हैं, जो बाह्य संसार को-अपने शरीर तक को भूलकर एकाग्र होकर अपने मन की भावना से निर्दिष्ट सामग्री को प्रत्यक्ष देखने का प्रयास कर सकते हैं । इस प्रयास में यह ‘मानस-पूजा-स्तोत्र’ बड़ा सहायक सिद्ध होता है ।

श्रीभगवती-मानस-पूजा-स्तोत्र    भगवान् श्रीशङ्कराचार्य विरचित श्रीभगवती-मानस-पूजा-स्तोत्र (हिन्दी पद्यानुवाद  प्रबोधन ॥

उषा-काल में गायक जन की मङ्गल-ध्वनि से शीघ्र जागिए । महती कृपा-कटाक्ष द्वारा, जगदम्बे ! जग को सुख-मय करिए ॥ १ ॥ 

॥ आवाहन ॥ 

स्वर्ण-वेदियों से अति शोभित, दिशि-दिशि स्वर्ण-कलश से सज्जित । मणि-मय मम मानस-मण्डप में, कृपया पूजन ग्रहण कीजिए ॥ २ ॥ 

॥ शिविका-समर्पण ॥ 

स्वर्ण-मयी, कोमल-पट-आवृत, सुन्दर गद्दे से स-शोभिता । जगदम्बे ! तुमको अर्पित मानस ‘शिविका’, नव-रत्न- अलंकृता ॥ ३ ॥ 

॥ मन्दिर-समर्पण ॥

मणि-मय निज ‘मन-मन्दिर’, जिसका शीर्ष कनक-घट से है शोभित । जिस पर जल-धर-चुम्बि पताका, वह मन्दिर निवास-हित अर्पित ॥ ४ ॥ 

॥ आसन-समर्पण ॥ 

मानस ‘सिंहासन’ की वेदी, सुन्दर रुइ-गद्दी से शाभित, और, ‘सुवर्ण-पीठ’ यह माँ, अगणित पुष्पों द्वारा आच्छादित । कोटि बाल-सूर्यों-सम तेज-स्वरूपा, हे भगवति ! विराजिए, और ‘सुवर्ण-पीठ’ पर माता, युगल चरण-कमलों को रखिए ॥ ५ ॥ 

॥ वितान-समर्पण ॥ 

कनक-जड़ित चार स्तम्भ-युक्त, मणि-मुक्ता की झालर से शोभित, अति सुन्दर नव मनज चँदोवा, हे भवानि ! है तुम्हें समर्पित ॥ ६ ॥

॥ पाद्य-समर्पण ॥ 

विष्णु-कान्ता, दूब, कमल – इसमें विभिन्न हैं पुष्प समन्वित – यह मानसिक ‘पाद्य’ माता, निज चरण-कमल-हित हो स्वीकारित ॥ ७ ॥

॥ अर्घ्य-समर्पण ॥

गन्ध, पुष्प, जौ, सरसों, दूर्वा, तिल, कुश, अक्षत-युक्त अर्ध्य’ यह, माँ ! कपया स्वीकारें, रत्नों-जटित कनक-घट बीच निहित यह ॥ ८ ॥ 

॥ आचमन ॥ 

अमृत-सम कङ्कोल, लौंग, जायफल, गन्ध-युत शीतल जल से – कमल-समान कान्ति-युत निज हाथों से देवि आचमन कर लें ॥ ९ ॥ 

॥ मधुपर्क-समर्पण ॥

स्वर्ण-पात्र में निहित, और जो रत्न-जटित ढक्कन से रक्षित । यह ‘मधुपर्क’ मानसिक, अर्पित तुमको, इसे ग्रहण माँ ! कर लें ॥ १० ॥ 

॥ तैल-समर्पण ॥ 

विविध भाँति के पुष्पों द्वारा है, यह बारम्बार सु-वासित, निहित रत्न-मय स्वर्ण-पात्र में, मँडराते भौरों से आवृत । एवं सुर-सुन्दरियों के हाथों द्वारा, चहुँ दिग् गृहीत जो – चम्पा, जिसका ‘तैल’ भ्रमर-कज्जली केश-घन में माँ ! तेरे – तथा सभी अङ्गों में निज मानस के श्रद्धा-पूर्ण भाव से – जगज्जननि ! करता हूँ लेपन, भगवति, अम्बे, भुवन-पालिके ॥ ११ ॥ 

॥ उद्वर्तन और जल-स्नान ॥ कुङ्कम-पङ्क, सुवर्ण-चूर्ण, केसर से युक्त सुगन्धित ‘उबटन ‘– तव शरीर में लेपन को मैं श्रद्धा-पूर्ण भावना करता । केश स्वच्छ कर आमलकों से, जो कस्तूरि आदि से सुरभित, सुरभित, गुनगुन रत्न-जटित घट के जल से मैं स्नान कराता ॥ १२ ॥ 

॥ दधि-दुग्ध आदि से स्नान ॥ श्वेत-शर्करा, दुग्ध, दही, घृत, मधु से पुनः तुम्हें नहलाता । पुनः गुनगुने जल से जननी, स्नेह-पात्र तव स्नान कराता ॥ १३ ॥ 

॥ तीर्थ-जल से स्नान ॥ 

खस, इलायची, पुष्पों से, गङ्गादि-तीर्थ के वासित जल से – निर्मल मुक्ता, माणिक्यों से युक्त, स्वच्छ स्वर्ण-मय जल से – स्नेह-सहित मम ‘स्नान-भाव’ स्वीकार करें, जो अम्बे ! अर्पित – सादर तन्त्र-वेद-मन्त्रों को उच्चारित कर प्रमुदित मन से ॥ १४ ॥

॥ वस्त्र-समर्पण ॥ 

बाल-सूर्य सम, दाड़िम पुष्पों की आभा से स्पर्धा करते – श्रेष्ठ दिव्य ‘वस्त्रों’ की मैंने आदर-पूर्ण भावना की है । मुक्ता-विंधी ‘कञ्चुकी’ भी, जो पीत-वर्ण, स्वीकार करें माँ । तप्त स्वर्ण द्युति -पूर्ण ‘ओढ़नी’, अनुपम अङ्गीकार करें माँ ॥ १५ ॥ 

॥ पादुका-समर्पण ॥

नौ रत्नों से सज्जित, सुन्दर ‘स्वर्ण-पादुकाओं’ पर अम्बे ! – लीला-पूर्वक आप कृपा कर, रखें चरण-द्वय निज, जगदम्बे ! ॥ १६ ॥ 

॥ केश-प्रसाधन ॥ 

देवि ! आपकी केश-राशि को, बहुल अगरु पुष्पों के द्वारा – सादर धूपित, कर कङ्घे से स्वच्छ, जननि ! मैं पूजन करता । सुरभित कमल तथा सुरभित चम्पक-सुमनों के द्वारा माता ! – तत्क्षण उन्हें स्वर्ण-सूत्रों से गूँध, केश मैं वेष्टित करता ॥ १७ ॥ 

॥ कज्जल-समर्पण ॥ 

स्वर्ण-शलाका द्वारा मैंने, ‘सौवीराञ्जन’ से है माता ! – तव नेत्रों को अम्बे ! रञ्जित किया-यदपि वह अमल नहीं है । तव सम्पर्क-प्राप्त अब उसको, अब ब्रह्मा, इन्द्रादिक द्वारा – वाञ्छित होने की अञ्जन’ को, जगदम्बे ! योग्यता प्राप्त है ॥ १८ ॥

॥ आभूषण-समर्पण ॥ 

चरणों में दो ‘नूपुर’, कटि में सुभग करधनी, वक्षस्थल पर – मुक्ताओं का ‘हार’ गले में नक्षत्रों की अनुपम ‘माला’, बाजूबन्द’ बाँह में, ‘कङ्गन’ रत्न-जटित तव दिव्य करों में, ‘कर्ण-फूल’ कानों में पहना ‘चूडा-मणि’ से शीश सजाता ॥ १९ ॥ देवि ! आपकी केशवेणियों में, सुवर्ण को ‘पुष्प’ लगाकर – ‘मोती-लड़ी’ माँग में, मस्तक स्वर्ण-तिलक’, ‘माणिक्य’ नाक में, वक्षस्थल पर ‘मोती की जाली’, अङ्गुलियों में अँगूठियाँ, जननी ! बालक तव कानों में, रत्न-जटित ‘कुण्डल’ पहिनाता ॥ २० ॥

॥ तिलक, अङ्गराग-समर्पण ॥ 

मातु । तुम्हारे अति उज्ज्वल मस्तक पर मैं केशर, कस्तूरी – कर्पूरागरु – ‘तिलक’ लगाता, ‘अङ्ग-राग’ तव दिव्य देह में । पुष्प द्रव से युक्त यक्ष-कर्दम का रस तव वक्षस्थल में – तब जगदम्ब ! लेप ‘कुङ्कुम’ का, करता मैं दोनों चरणों में ॥ २१ ॥ 

॥ अक्षत-समर्पण ॥

रत्न-रूप ‘अक्षत’, सुन्दर अन-बिधे मोतियों, निश्क्षत जौ से, मानस-पूजन करता माँ ! मैं या केसर-रञ्जित ‘अक्षत’ से ॥ २२ ॥ 

॥ सुगन्धित द्रव्य-समर्पण ॥ चम्पक-तैल, सुगन्धित चन्दन, कस्तूरी, रेशमी वस्त्र ये, जननि ! शीघ्र स्वीकार करें इनको, प्रस्तुत हैं द्रव्य चार ये ।। २३ ॥ सिन्दूर-समर्पण ॥

हे भगवति ! आपकी माँग में, यह सिन्दूर स-आदर सज्जित – मेरे हृदय-कमल पर वर्षा करे हर्ष को माँ, जगदम्बे ! उदय-काल की सूर्य-प्रभा-सम, सदा रक्त-वर्णी रहती है , अतः ध्यान करने पर अन्तःकरण-कलुष हरती यह अम्बे ! ॥ २४ ॥ 

॥ पुष्प-समर्पण ॥ 

लौंग, कन्द, मन्दार ‘पुष्प’, करवीर दिव्य सुमनों से सादर – माँ त्रैलोक्य-मोहिनी ! तेरा पुत्र निरन्तर अर्चन करता ॥ जूही, गुड़हल, मौलसिरी, चम्पा, केतकी, चमेली जैसे – सुन्दर सुमन, सुवन यह तेरा, तुझको देवि ! समर्पण करता ॥ २५ ॥ 

सोनजुही कचनार, केवड़ा, मौलसिरी, मालती, चमेली – “पुष्प’ कनेर आदि द्वारा माँ ! तव शरीर का पूजन करता ॥ २६ ॥ 

इसी भाँति ही रक्त-कमल से, श्वेत-कमल जल-वेतस पुष्पों – द्वारा भी तेरे शरीर का आदर से परिपूजन करता ॥ २७ ॥ ॥ धूप-समर्पण ॥ 

श्वेतभ्रक के साथ, लाख से युक्त, बिल्व-मिश्रित कपूर से – सुरभित मधु, शर्करा-युक्त, गो-घृत में सने अगरु-चन्दन से – ‘धूप-भावना’, गुग्गुल आदि अनेक वस्तुओं से यह निर्मित, कृपया स्नेह-सहित स्वीकारें, करता अर्पित माँ ! तेरे हित ॥ २८ ॥ 

॥ आरती (नीराजन) ॥ 

रत्न-जटित इस स्वर्ण-पात्र में स्थापित ये सुन्दर ‘दीपक’ हैं, गो-घृत से प्रज्ज्वलित; कोटि-सूर्यों सम द्युति से अन्धकार को – दूर भगाने में समर्थ स्वर्णाग्नि-शिखा, इन दीपों की है, प्रति-दिन सदा ‘आरती’ करता, ले ऐसे मणि-मय दीपों को ॥ २९ ॥ 

॥ तर्पण ॥ 

दही, दुग्ध, शर्करा, सुगन्धित शालि-खीर, घृत, वटक दही के, माल-पुआ, मधु एवं कदली आदि विभिन्न फलों को मैं माँ – धनियाँ, जीरा, हींग और अदरख, हल्दी के साथ सुवासित – अमृत से भी अधिक स्वाद के शाक अर्पित कर तृप्त करूँ माँ ! ॥ ३० ॥ 

॥ नैवेद्य-समर्पण ॥ 

दाल, दही, शर्करा, दुग्ध, घी, पुए प्रभृति यह परम अन्न लें । जीरा, हींग, मिर्च आदिक से युक्त, शाक कृपया माँ खाएँ ॥ ३१ ॥ 

॥ दुग्ध-समर्पण ॥ 

यह घृत-खीर उत्तमोत्तम है, करें कृपा-स्वीकार करें माँ ! । ‘उत्तम मधु-अमृत समान, यह ‘दुग्ध’ कृपाकर पान करें माँ ! ॥ ३२ ॥

॥ हाथ-मुख-प्रक्षालन ॥ 

दोनों हाथ और मुख को, इस कांस्य-पात्र में गुन-गुन जल से – प्रक्षालन कर, कुंकुम और कपुर-युक्त चन्दन हाथों पर उबटन कर लें ॥ ३३ ॥ 

॥ गङ्गा-जल-समर्पण ॥ 

शुचि ‘गङ्गा-जल’ वासित खस से, पट से छाना अम्ब ! सुधा-सम, स्वर्ण-कलश में शुद्ध निषेवित, ‘गङ्गा-जल’ माँ ! कृपया पी लें ॥ ३४ ॥ 

॥ फल-समर्पण ॥ 

केला, जामुन, आम, बेर, अङ्गुर, अनार, नारियल अर्पित । निम्बु, बिजौरा, खरबूजा, नारङ्गी ‘फल’, अखरोट समर्पित ॥ ३५-३६ ॥ 

॥ ताम्बूल-समर्पण ॥ 

लौंग, कपूर, श्वेत कत्था, तक्कोल-चूर्ण, स्वादिष्ट सुपारी, मधुर जायफल आदि समर्पित कैतक-श्वेत ‘पान-पत्ते’ में ॥ मात ! सुवासित ‘ताम्बूल’ यह, मुख-छवि-शोभा-हित स्वीकारें । है सुरभित इलायची भी शोभित, हे अम्बे ! इस पत्ते में ॥ तप्त स्वर्ण-आभा से भी सुन्दर ‘ताम्बूल’, स्वर्ण-सी पुङ्गी, स्वर्ण-पात्र-रक्षित, मोती-कत्थे का पान मुख-कमल रख लें ॥ ३७-३९ ॥

॥ आरती-समर्पण ॥ 

डमरू-जैसे वृहत् दीपकों, जो आबद्धित पक्व गेहुँ से – में पर्याप्त डाल घृत, रखकर अम्बे ! विस्तृत स्वर्ण-पात्र में, घुटने टेक, विनम्र हृदय से, ‘पात्र-आरती’ शिर पर रखकर, तव मुख-मण्डल ओर घुमाता, साढे तीन बार जगदम्बे ! ॥ प्रति-दिन इस प्रकार माँ ! तेरी, माता ! सदा ‘आरती’ करता । ऐसा कर, मुझको है तेरी दया-दृष्टि मिलती जगदम्बे ! ॥ ४०-४१ ॥ 

॥ दक्षिणा-समर्पण ॥

इन मणि-युक्त मोतियों द्वारा, तेरे ऊपर वर्षा करके – तीन लोक के सबसे सुन्दर वस्त्रों द्वारा पूजन करता । बहु प्रकार के मोती एवं माणिक्यों से युक्त स्वर्ण की – वर्षा-रूपी दिव्य ‘दक्षिणा’, त्रैलोकेश्वरि ! मैं अर्पित करता ॥ ४२ ॥

॥ छत्र-समर्पण ॥ 

स्वर्ण-दण्ड-भूषित, शोभित जो बिम्ब-समान पूर्ण-शशि-जैसा – शोभा-शाली, स्वर्ण-कलश-युत रत्न-खचित अति शोभा देता । मुक्ताओं की जाली से आच्छादित, दिव्य छत्र जगदम्बे ! ॥ स्वयं विश्वकर्मा-निर्मित, त्रैलोकों को आह्लादित करता । सृष्टि-स्वरूपा माता ! तेरा रूप हृदय-धर बालक तेरा – प्रेम-पूर्वक हाथों में कर ‘छत्र ग्रहण, शिर छाया करता ॥ ४३ ॥

॥ चँवर ॥ 

शरच्चन्द्र की किरणों जैसा, गौर-वर्ण मुक्ता-मणि-शोभित- स्वर्ण-दण्ड-युत ‘चँवरों द्वारा स्नेहासक्त हवा मैं करता ॥ ४४ ॥ 

॥ दर्पण ॥ 

रवि-मण्डल-सम, मणि-वेष्टित, यह ‘दर्पण’ अम्बे चञ्चल-नयने ! – अर्पित-इसमें पूर्ण-चन्द्र-सम, निज सुन्दर मुख-मण्डल देखें ॥ ४५ ॥ 

॥ नीराजन ॥ 

इन्द्र आदि देवता सभी अम्बे ! तुमको प्रणाम जब करते – लगता, मुकुट-दीपकों से, तव चरण-पृष्ठ की ‘आरति’ करते । कोटि दीपकों को निज-मानस में, मैं भी कल्पित करता हूँ, और तुम्हारे सारे तन की, जगदम्बे ! ‘आरति’ करता हूँ ॥ ४६ ॥ 

॥ वाहनार्थ अश्व-समर्पण ॥

तुङ्ग ‘अश्व’ गतिशील, युक्त जो रत्नों द्वारा जटित जीन से, स्वर्ण-भूषणों से भूषित, गम्भीर मधुर स्वर, अनल-वेग से – जो चलता है, सर्व-गुणों से युक्त ‘अश्व’ वह, तव वाहन-हित – एवं शत ऐसे ही सुन्दर ‘अश्व’ देवि ! हैं तुम्हें समर्पित ॥ ४७ ॥ 

॥ गज-समर्पण ॥ 

भौंर-वृन्द से घिरी कनपटी, आच्छादित सिन्दूर-चूर्ण से – स्वर्ण-विनिर्मित किङ्किणि, घण्टे से है जिसका कण्ठ सुशोभित । चँवरों, जैसे जिसके कर्ण-युगल हैं , ऐसा मतवाला गज – घने जलद की आभावाला, जननी ! करे तुम्हें आनन्दित ॥ ४८ ॥

॥ रथ-समर्पण ॥ 

द्रुत-तम वेग-वान अश्वों से शोभित, जिसके चक्र मणि-जटित- स्वर्ण-वितान-युक्त सुन्दर ‘रथ’, करता भगवति ! तुम्हें समर्पित ॥ ४९ ॥

॥ चतुरङ्ग सैन्य-समर्पण ॥ 

हय, गज, रथ-आरोहित एवं अन्य सैनिकों द्वारा शोभित, घन-सम दुन्दुभि-ध्वनि करती दश दिश, ‘चतुरङ्ग सैन्य’ है अर्पित ॥ ५० ॥ 

॥ दुर्ग-समर्पण ॥ 

सप्त-सागरों की खाँई से घिरा, अत्यधिक सम्पति-शाली, पृथ्वी-तल नामक, विशाल, दृढ़ ‘दुर्ग’ समग्र देवि ! है अर्पित ॥ ५१ ॥ 

॥ व्यजन-समर्पण ॥ 

श्वेत-कमल से युक्त, सहज-शीतल-मधु-पवन-सुगन्धित, युक्ता – पङ्खों से; पराग-पीता भौरों से गुञ्जित ‘व्यजन’ डुलाता ॥ ५२ ॥

॥ नृत्य-वाद्य-गायन-समर्पण ॥

जिसके चञ्चल केश-पाश, भौंरों-से काले, घुँघराले हैं, टूटे जिसके सुमन-माल, इस रङ्ग-भूमि ऊपर बिखरे हैं, नृत्य-रती यह नटी तुम्हारा, हृदय-कमल आनन्दित कर दे, जगज्जननि ! यह ‘नृत्य’ हृदय में तेरे अम्ब ! मधुर रस भर दे ॥ ५३ ॥ युव-जन-सुख-प्रद बालाएँ ये, अति सुन्दर क्रीड़ा करती हैं, मुख, भौं, नयन नचाने से, इनकी बेणी चञ्चल होती है । चञ्चल भृङ्ग -सुशोभित पुष्पों से शोभित ये नृत्य कर रहीं, रङ्ग-भवन में थिरक रहीं, माँ तेरे उर आनन्द भर रहीं ॥ ५४ ॥ रुचिर कुचोंवाली नर्तकियाँ, प्रति-गृह प्रति-दिन नर्तन करतीं, झिमिकि-झिमिकि, धिधि-धिद्धि, धिद्धि-धिधि-ऐसी सदा ताल-ध्वनि आती । तत्-तत्, थैपी-थैपी ध्वनि, जगदम्बे ! उर आह्लादित करती, नाद-जन्य यह ध्वनि तेरे, मन की प्रसन्नता हेतु गूँजती ॥ ५५ ॥ 

चञ्चल केश-राशि उनकी-ज्यों भौंरों के समूह मँडराएँ , जिनके स्मित-युत-मुख की शोभा निरख, कमल के पुष्प लजाएँ । जो हैं दिव्य-रूप परिपूर्णा, अनुपम, अति सुन्दर पट-वेष्टित, नृत्य-रती नटियों के मधु-स्वर तव आनन्द हृदय उपजाएँ ॥ ५६ ॥ 

डमरू -डिम्डिम, झल्लरि-जर्झर-मधुर शब्दवाले घण्टों से – तत्क्षण झंकृत ध्वनियाँ तेरे, सदय हृदय को सुख पहुँचाएँ ॥ ५७ ॥

वीणाओं के सप्त सुरों पर, मधुर राग में वादन करतीं – माता ! तेरे स्वर्ण-द्वार पर, स्वर्गिक मधुर स्वरों में गाती – तेरी महिमा के मधु गीतों को, गन्धर्वों की कन्याएँ । तेरा पुत्र प्रार्थना करता, देव-पूजिता ! कृपया सुन लें ॥ ५८ ॥ नर्तकियों के सुन्दर और विलक्षण नृत्यों से माँ ! तुझको – क्षण-भर को भी आनन्दित करके भगवति, जगदीश्वरि, अम्बे ! – स्वयं पुत्र तेरा मैं अपने गायन, वाद्य, विचित्र नृत्य से – तेरे मन को आह्लादित, आनन्दित करता माँ, जगदम्बे ! ॥ ५९ ॥ 

॥ स्तुति ॥

ब्रह्मा आदि चार मुख से भी निपुण नहीं वर्णन करने में – तेरे गुण; तब एक-मुखी, कैसे समर्थ तव ‘स्तुति’ करने में ॥ ६० ॥ ॥ प्रदक्षिणा ॥ 

कर ‘प्रदक्षिणा’ अश्वमेध-से यज्ञों का फल अर्चक पाता – प्रति पग पर, ऐसी अघ-नाशक तेरी, माँ ! प्रदक्षिणा करता ॥ ६१ ॥

॥ प्रणाम-समर्पण ॥ 

रक्त-कमल-सम लाल प्रभावाले तलुओं का वन्दन करता, ऊर्ध्व-रेख के कुलिश-चिह्नवाले पद का अभिनन्दन’ करता । सभी देवताओं द्वारा वन्दित तेरे युग पद-कमलों का, अष्टाङ्गों द्वारा माता ! तेरा सुत सविनय ‘वन्दन’ करता ॥ ६२ ॥ ॥ पुष्पाञ्जलि ॥

भगवति। तेरे युगल चरण-कमलों का पङ्कज-पुष्पों द्वारा – पूजन कर, तवे कण्ठ-देश में, स्वर्ण-नलिन-माला पहिनाकर – तेरे हृदय-कमल को प्रमुदित करने की आकांक्षा करता, रत्नों की ‘पुष्पाञ्जलि’ शिर पर, आदर-पूर्वक अर्पित करता ॥ ६३ ॥

॥ भवन-समर्पण ॥ 

यह ‘प्रासाद’ निवास-हेतु है, यह है स्वर्ण-वितान सुसज्जित, धूपित है मणि-जटित मञ्च यह, अगरु, धूप से भवन सुगन्धित ॥ ६४ ॥ 

॥ पर्यङ्क-समर्पण ॥ 

माणिक-सज्जित स्वर्ण-पीठ पर, अभय, वरद चरणों को रख कर – बैठें, कोमल पट आच्छादित, जगदम्बे ! इस ‘स्वर्ण-पलँग’ पर ॥ ६५ ॥ 

॥ आलता-समर्पण ॥ 

माता ! तेरे युगल-चरण हैं, पद्म-राग-मणि से भी सुन्दर, कमल-चिह से शोभित, इन चरणों का शुभ दर्शन करता हूँ ॥ अतिशय शोभा मैं निहारता, रक्ताभा-रजित चरणों की – और ‘महावर’ द्वारा इनको, पुनः लालिमा से भरता हूँ ॥ ६६ ॥ 

॥ गण्डुष-पात्र-समर्पण ॥ 

सुरभित ताम्बूल से रञ्जित, खस से देवि ! सुगन्धित मुख के – इस गण्डूष-सुवासित रस को, स्वर्णिम ‘पीक-दान’ में छोडें ॥ ६७ ॥ 

॥ शयन-प्रार्थना ॥ 

अति कोमल रुइ के गद्दे की, शैया पर सुख-पूर्वक सोएँ – क्षण भर शिव के सङ्ग अकेले, पर निज सुत को माँ ! न भुलाएँ ॥ ६८ ॥ 

॥ ध्यान ॥ 

मुक्ता, कुन्द-पुष्प, शशि-सम, जो त्रिभुवन-जननी गौर-वर्ण हैं, जिनका माणिक-जटित मुकुट है, गर्भित रत्न कर्ण- भूषण हैं, हाथों से जो अक्ष-माल, पुस्तक, वर और अभय-युक्ता हैं, जो त्रिलोचना माँ मस्तक पर, चन्द्र-कला से संयुक्ता हैं, देवों के मणि-मय मुकुटों से द्योतित स्वर्ण-पीठ है जिनका, जिस पर आनन्दित विराजतीं, मन में ध्यान करू उन माँ का ॥ ६९ ॥ 

॥ क्षमा-प्रार्थना ॥ 

भक्ति-सहित मैंने यह ‘मानस-पूजन’ हेतु कल्पना की है । कर मेरे अपराध क्षमा’, जगदीश्वरि ! यह पूजन स्वीकारें ॥ जो भी इसमें न्यून मिले, हो पूर्ण कृपा से माँ, सुरेश्वरी ! । मेरे हृदय-पटल में अम्बे ! तब निवास हो सदा ईश्वरी ! ॥ ७० ॥ 

॥ फल- श्रुति ॥

सुधी व्यक्ति- असमर्थ बाह्य-पूजन में, जो यह पाठ करेगा, निज अभीष्ट हो प्राप्त, बाह्य-पूजन का फल वह प्राप्त करेगा ॥ ७१ ॥ 

भक्ति-सहित जो साधक प्रति-दिन करे पाठ ‘मानस-पूजन का – वाग्-दायिनी के प्रसाद से, एक वर्ष में ‘कवि’ बन जाता ॥ ७२ ॥ 

प्रातः वा मध्याह्न-काल वा सन्ध्या-समय पाठ करता जो, ‘धर्म-अर्थ-कामना पूर्ण हो, और ‘शिवत्व प्राप्त हो उसको ॥ ७३ ॥

भाग्योदय मंत्र-

Mantra For Good Luck: सोया हुआ भाग्य जगा देगा ये चमत्कारी मंत्र, नियमित जाप से हो सकता है सभी दुखों का नाश

Mantra For Good Luck: संसार में हर व्यक्ति की किस्मत एक जैसी नहीं होती, अपने कर्मों और मेहनत के आधार पर ही उसके जीवन की स्थिति बनती है। हां कुछ लोगों का भाग्य इतना तेज होता है कि बिना ज्यादा प्रयास किए ही उन्हें सफलता मिल जाती है। तो वहीं दूसरी तरफ कुछ लोगों को पूरी मेहनत के बाद भी उसका आधा ही फल मिलता है और फिर वह व्यक्ति अपने भाग्य को कोसने लगता है, लेकिन ज्योतिष शास्त्र में भाग्य तेज करने के लिए कई तरह के उपाय बताए गए हैं। जो व्यक्ति के भाग्य को बदलने व सोये हुए भाग्य को जगाने के लिए कारगर साबित होते हैं। जिसमें से एक उपाय है चमत्कारी मंत्र का जाप। जी हां, ज्योतिष में एक ऐसा ही चमत्कारी मंत्र बताया गया है जो भाग्य को चमकाने का काम करता है, साथ ही जीवन में सुख-शांति भी लाता है। आइए जानते हैं कौन सा है वो मंत्र, कैसे करें इसका जाप और क्या-क्या मिलेंगे लाभ-

भाग्योदय मंत्र- ॐ ऐं श्रीं भाग्योदयं कुरु कुरु श्रीं ऐं फट् ।।                                                                           

लाभ- मान्यताओं के अनुसार इस मंत्र का विधिवत जाप करने से व्यक्ति के जीवन में पॉजिटिव एनर्जी का संचार होता है। इसके साथ ही उसके जीवन में सुख-शांति आती है और धन संबंधी परेशानियां भी दूर हो जाती है। प्रतिदिन नियमानुसार इस मंत्र का जाप करने से मनुष्य का सोया हुआ भाग्य जाग जाता है।                                        भाग्यनोत्ति मंत्र के जाप की विधि

मान्यताओं के अनुसार इस मंत्र का विधिवत जाप करना बहुत जरूरी है वरना इसका फल व्यक्ति का नहीं मिलेगा और मेहनत बेकार जा सकती है। तो आइए जानते हैं इसे जपने की सही विधि के बारे में-

1. इस मंत्र का जाप हमेशा सोने से पहले करना चाहिए।

2. इस मंत्र का जाप कम से कम 11 बार जरूर करें

3. इसे आप अपनी इच्छा अनुसार 21 या 51 बार भी कर सकते हैं।

4. इस भाग्योन्नति मंत्र का जाप लगातार 21 दिनों तक करना है।

5. इस मंत्र के जप के पहले अपने हाथ पैर धो लें और फिर जाप के लिए बैठें

6. इस मंत्र जाप के बाद भगवान का धन्यवाद जरुर करें।

7. भाग्यनोत्ति मंत्र बंद किस्मत के दरवाजे खोलने का सबसे प्रभावी मंत्र है।

स्वस्ति वाचन

कोई भी शुभ कार्य प्रारम्भ करते समय मंगल कामना की जाती है, जिसके हेतु गणपति महाराज और माँ भगवती-अम्बिका का ध्यान किया जाता है। 

स्वस्तिवाचन

स्वस्तिक मंत्र शुभ और शांति के लिए प्रयुक्त होता है। स्वस्ति = सु + अस्ति = कल्याण हो। इससे हृदय और मन मिल जाते हैं। मंत्रोच्चार करते हुए दर्भ से जल के छींटे डाले जाते हैं. यह माना जाता है कि यह जल पारस्परिक क्रोध और वैमनस्य को शांत कर रहा है। स्वस्ति मन्त्र का पाठ करने की क्रिया ‘स्वस्तिवाचन’ कहलाती है।

ॐ स्वस्ति न इन्द्रो वृद्धश्रवाः। स्वस्ति नः पूषा विश्ववेदाः।

स्वस्ति नस्तार्क्ष्यो अरिष्टनेमिः। स्वस्ति नो बृहस्पतिर्दधातु॥

ॐ शान्तिः शान्तिः शान्तिः॥
गृहनिर्माण के समय स्वस्तिक मंत्र बोला जाता है। मकान की नींव में घी और दुग्ध छिड़का जाता था। ऐसा विश्वास है कि इससे गृहस्वामी को दुधारु गाएँ प्राप्त हेती हैं एवं गृहपत्नी वीर पुत्र उत्पन्न करती है। खेत में बीज डालते समय प्रार्थना की जाती है  कि विद्युत् इस अन्न को क्षति न पहुँचाए, अन्न की विपुल उन्नति हो और फसल को कोई कीड़ा न लगे। पशुओं की समृद्धि के लिए भी स्वस्तिक मंत्र का प्रयोग होता है जिससे उनमें कोई रोग ना लगे। गायों को खूब बच्चे उत्पन्न करें। 

यात्रा के आरंभ में स्वस्तिक मंत्र बोला जाता है ताकि यात्रा सफल और सुरक्षित हो, मार्ग में हिंसक पशु या चोर और डाकू ना मिलें। व्यापार में लाभ हो। अच्छे मौसम के लिए भी इस मन्त्र का जाप किया जाता है, जिससे दिन और रात्रि सुखद हों, स्वास्थ्य लाभ हो तथा खेती को कोई हानि न हो।

पुत्रजन्म पर स्वस्तिक मंत्र अत्यावश्यक है। इससे बच्चा स्वस्थ रहता है, उसकी आयु बढ़ती थी और उसमें शुभ गुणों का समावेश होता है। इसके अलावा भूत, पिशाच तथा रोग उसके पास नहीं आ सकते थे। षोडश संस्कारों में भी इस मंत्र का उपयोग किया जाता है। स्वस्तिक मंत्र शरीर रक्षा, सुखप्राप्ति एवं आयुवृद्धि के लिए प्रयुक्त होता है। 

स्वस्तिवाचन :: यजमान हाथ में पुष्प लेकर गणेश जी महाराज और माँ अम्बिका का ध्यान करें करते हुए निम्न मन्त्रों का पाठ-उच्चारण करें  :- 

सुमुखश्चैकदन्तश्च कपिलो गजकर्णकः। लम्बोदरश्च विकटो विघ्ननाशो विनायक:॥ 

धूम्रकेतुर्गणाध्यक्षो भालचन्द्रो गजानन:। द्वद्शैतानि नामानि यः पठे च्छ्रिणुयादपी॥ 

विद्यारंभे विवाहे च प्रवेशे निर्गमे तथा। संग्रामे संकटे चैव विघ्नस्तस्य न जायते॥ 

शुक्लाम्बरधरं देवं शशिवर्णं चतुर्भुजम्। प्रसन्नवदनं ध्यायेत्  सर्व्विघ्नोपशान्तये॥ 

अभिप्सितार्थ सिद्ध्यर्थं पूजितो य: सुरासुरै:। सर्वविघ्नहरस्तस्मै गणाधिपतये नम:॥ 

सर्वमङ्गलमाङ्गल्ये शिवे सर्वार्थसाधिके। शरण्ये त्र्यम्बिके गौरी नारायणि नमोस्तुते॥ 

सर्वदा सर्वकार्येषु नास्ति तेषाममङ्गलम्। येषां हृदयस्थो भगवान् मङ्गलायतनो हरि:॥ 

तदेव लग्नं सुदिनं तदेव  ताराबलं चन्द्रबलं तदेव। 

विद्याबलं दैवबलं तदेव लक्ष्मीपते तेन्घ्रियुगं स्मरामि॥ 

लाभस्तेषां जयस्तेषां कुतस्तेषां पराजय:। येषामिन्दीवरश्यामो हृदयस्थो जनार्दन:॥ 

यत्र योगेश्वर: कृष्णो यत्र पार्थो धनुर्धर:। तत्र श्रीर्विजयो भूतिर्ध्रुवा नीतिर्मतिर्मम॥ 

अनन्यास्चिन्तयन्तो मां ये जना: पर्युपासते। 

तेषां नित्याभियुक्तानां योगक्षेमं वहाम्यहम्॥ 

स्मृतेःसकल कल्याणं भाजनं यत्र जायते। पुरुषं तमजं नित्यं व्रजामि शरणं हरम्॥ 

सर्वेष्वारंभ कार्येषु त्रय:स्त्री भुवनेश्वरा:। देवा दिशन्तु नः सिद्धिं ब्रह्मेशानजनार्दना:॥ 

विश्वेशम् माधवं दुन्धिं दण्डपाणिं च भैरवम्। 

वन्दे कशी गुहां गंगा भवानीं मणिकर्णिकाम्॥ 

वक्रतुण्ड् महाकाय सूर्य कोटि समप्रभ। निर्विघ्नं कुरु में देव सर्वकार्येषु सर्वदा॥ 

ॐ श्री गणेशाम्बिका भ्यां नम:। 

हाथ में लिया हुआ पुष्प गणेश जी महाराज माँ अम्बिका की मूर्ति या सुपारी से बनाए हुए भगवान् पर चढ़ा दें। इसके पश्चात दाँये हाथ में पुष्प, कुश, तिल, जौ, जल, द्रव्य  लेकर संकल्प करना चाहिए।  

आ नो भद्राः क्रतवो यन्तु विश्वतोऽदब्धासो अपरीतास उद्भिदः।  

देवा नोयथा सदमिद् वृधे असन्नप्रायुवो रक्षितारो दिवेदिवे॥1॥

हमारे पास चारों ओर से ऐंसे कल्याणकारी विचार आते रहें जो किसी से न दबें, उन्हें कहीं से बाधित न किया जा सके एवं अज्ञात विषयों को प्रकट करने वाले हों। प्रगति को न रोकने वाले और सदैव रक्षा में तत्पर देवता प्रतिदिन हमारी वृद्धि के लिए तत्पर रहें। 

देवानां भद्रा सुमतिर्ऋजूयतां देवानां रातिरभि नो नि वर्तताम्।  

देवानां सख्यमुप सेदिमा वयं देवा न आयुः प्र तिरन्तु जीवसे॥2॥

यजमान की इच्छा रखने वाले देवताओं की कल्याण कारिणी श्रेष्ठ बुद्धि सदा हमारे सम्मुख रहे, देवताओं का दान हमें प्राप्त हो, हम देवताओं की मित्रता प्राप्त करें, देवता हमारी आयु को जीने के निमित्त बढ़ायें।

तान् पूर्वयानिविदाहूमहे वयंभगं मित्रमदितिं दक्षमस्रिधम्।

अर्यमणंवरुणंसोममश्विना सरस्वती नः सुभगा मयस्करत्॥3॥

हम वेदरुप सनातन वाणी के द्वारा अच्युतरुप भग, मित्र, अदिति, प्रजापति, अर्यमण, वरुण, चन्द्रमा और अश्विनी कुमारों का आवाहन करते हैं। ऐश्वर्यमयी सरस्वती महावाणी हमें सब प्रकार का सुख प्रदान करें।

 तन्नो वातो मयोभु वातु भेषजं तन्माता पृथिवी तत् पिता द्यौः।  

तद् ग्रावाणः सोमसुतो मयोभुवस्तदश्विना शृणुतं धिष्ण्या युवम्॥4॥

वायुदेवता हमें सुखकारी औषधियाँ प्राप्त करायें। माता पृथ्वी और पिता स्वर्ग भी हमें सुखकारी औषधियाँ प्रदान करें। सोम का अभिषव करने वाले सुखदाता ग्रावा उस औषधरुप अदृष्ट को प्रकट करें। हे अश्विनी-कुमारो! आप दोनों सबके आधार हैं, हमारी प्रार्थना सुनिये।

तमीशानं जगतस्तस्थुषस्पतिं धियंजिन्वमवसे हूमहे वयम्। 

पूषा नो यथा वेदसामसद् वृधे रक्षिता पायुरदब्धः स्वस्तये॥5॥

हम स्थावर-जंगम के स्वामी, बुद्धि को सन्तोष देनेवाले रुद्रदेवता का रक्षा के निमित्त आवाहन करते हैं। वैदिक ज्ञान एवं धन की रक्षा करने वाले, पुत्र आदि के पालक, अविनाशी पुष्टि-कर्ता देवता हमारी वृद्धि और कल्याण के निमित्त हों।

स्वस्ति न इन्द्रो वृद्धश्रवाः स्वस्ति नः पूषा विश्ववेदाः। 

स्वस्ति नस्तार्क्ष्यो अरिष्टनेमिः स्वस्ति नो बृहस्पतिर्दधातु॥6॥

महती कीर्ति वाले ऐश्वर्यशाली इन्द्र हमारा कल्याण करें, जिसको संसार का विज्ञान और जिसका सब पदार्थों में स्मरण है, सबके पोषणकर्ता वे पूषा (सूर्य) हमारा कल्याण करें। जिनकी चक्रधारा के समान गति को कोई रोक नहीं सकता, वे गरुड़देव हमारा कल्याण करें। वेदवाणी के स्वामी बृहस्पति हमारा कल्याण करें।

पृषदश्वा मरुतः पृश्निमातरः शुभंयावानो विदथेषु जग्मयः।

अग्निजिह्वा मनवः सूरचक्षसो विश्वे नो देवा अवसा गमन्निह॥7॥

चितकबरे वर्ण के घोड़ों वाले, अदिति माता से उत्पन्न, सबका कल्याण करने वाले, यज्ञशालाओं में जाने वाले, अग्निरुपी जिह्वा वाले, सर्वज्ञ, सूर्यरुप नेत्र वाले मरुद्गण और विश्वेदेव देवता हविरुप अन्न को ग्रहण करने के लिये हमारे इस यज्ञ में आयें।

भद्रं कर्णेभिः शृणुयाम देवा भद्रं पश्येमाक्षभिर्यजत्राः।

स्थिरैरंगैस्तुष्टुवांसस्तनूभिर्व्यशेम देवहितं यदायुः॥8॥

 हे यजमान के रक्षक देवतागण! हम दृढ अंगों वाले शरीर से पुत्र आदि के साथ मिलकर आपकी स्तुति करते हुए कानों से कल्याण की बातें सुनें, नेत्रों से कल्याणमयी वस्तुओं को देखें, देवताओं की उपासना-योग्य आयु को प्राप्त करें। 

शतमिन्नु शरदो अन्ति देवा यत्रा नश्चक्रा जरसं तनूनाम।

पुत्रासो यत्र पितरो भवन्ति मा नो मध्या रीरिषतायुर्गन्तोः॥9॥

हे देवता गण! आप सौ वर्ष की आयु-पर्यन्त हमारे समीप रहें, जिस आयु में हमारे शरीर को जरावस्था प्राप्त हो, जिस आयु में हमारे पुत्र पिता अर्थात् पुत्रवान् बन जाएँ, हमारी उस गमनशील आयु को आपलोग बीच में खण्डित न होने दें।

अदितिर्द्यौरदितिरन्तरिक्षमदितिर्माता स पिता स पुत्रः।

विश्वेदेवा अदितिः पंचजना अदितिर्जातमदितिर्जनित्वम॥10॥

अखण्डित पराशक्ति स्वर्ग है, वही अन्तरिक्ष-रुप है, वही पराशक्ति माता-पिता और पुत्र भी है। समस्त देवता पराशक्ति के ही स्वरुप हैं, अन्त्यज सहित चारों वर्णों के सभी मनुष्य पराशक्तिमय हैं, जो उत्पन्न हो चुका है और जो उत्पन्न होगा, सब पराशक्ति के ही स्वरुप हैं।

ॐ द्यौ: शान्तिरन्तरिक्षँ शान्ति:, पृथ्वी शान्तिराप: शान्तिरोषधय: शान्ति:। 

वनस्पतय: शान्तिर्विश्वे देवा: शान्तिर्ब्रह्म शान्ति:, सर्वँ शान्ति:, शान्तिरेव शान्ति:, सा मा शान्तिरेधि॥11॥ ॐ शान्ति: शान्ति: शान्ति:॥

द्युलोक शान्तिदायक हों, अन्तरिक्ष लोक शान्तिदायक हों, पृथ्वी लोक शान्तिदायक हो। जल, औषधियाँ और वनस्पतियाँ शान्तिदायक हों। सभी देवता, सृष्टि की सभी शक्तियाँ शान्तिदायक हों। ब्रह्म अर्थात महान परमेश्वर हमें शान्ति प्रदान करने वाले हों। उनका दिया हुआ ज्ञान, वेद शान्ति देने वाले हों। सम्पूर्ण चराचर जगत शान्ति पूर्ण हों अर्थात सब जगह शान्ति ही शान्ति हो। ऐसी शान्ति मुझे प्राप्त हो और वह सदा बढ़ती ही रहे। अभिप्राय यह है कि सृष्टि का कण-कण हमें शान्ति प्रदान करने वाला हो। समस्त पर्यावरण ही सुखद व शान्तिप्रद हो।

शान्ति पाठ :: किसी भी प्रकार के शुभ कार्य को करते हुए शान्ति पाठ अवश्य करें :-

ॐ आनोभद्रा: क्रतवो यन्तु विस्वतो दब्धासो अपरीतास उद्भिद:। 

देवानो यथा सदमिद वृधे असन्नप्रायुवो रक्षितारो दिवे दिवे॥  

देवानां भद्रा सुमतिर्रिजुयताम देवाना ग्वंग रातिरभि नो निवार्ताताम।

देवानां ग्वंग सख्यमुपसेदिमा वयम देवान आयु: प्रतिरन्तु जीवसे॥  

तान पूर्वया निविदा हूमहे वयम भगं मित्र मदितिम दक्षमस्रिधम। 

अर्यमणं वरुण ग्वंग सोममस्विना सरस्वती न: सुभगा मयस्करत॥ 

तन्नोवातो मयोभूवातु भेषजं तन्नमाता पृथिवी तत्पिता द्यौ:।   

तद्ग्रावान: सोमसुतो मयोभूवस्तदस्विना श्रुनुतं धिष्ण्या युवं॥ 

तमीशानं जगतस्तस्थुखसपतिं धियंजिन्वमवसे हूमहे वयम। 

पूषा नो यथा वेद सामसद वृधे रक्षिता पायुरदब्ध: स्वस्तये॥  

स्वस्ति न इन्द्रो वृद्ध श्रवा: स्वस्ति न पूषा विस्ववेदा:। 

स्वस्ति नस्तार्क्ष्यो अरिष्टनेमि: स्वस्ति नो वृहस्पति दधातु॥  

पृषदश्वा मरुत: प्रिश्निमातर: शुभं यावानो विदथेषु जग्मय:। 

अग्निजिह्वा मनव: सूरचक्षसो विश्वे नो देवा अवसागमन्निह॥  

भद्रं कर्णेभि: शृणुयाम देवा भद्रं पश्येमाक्षभिर्यजत्राः।  

स्थिरैरङ्गैस्तुष्टुवा ग्वंग  सस्तनूभिर्व्यशेमहि देवहितं यदायु:॥

शतमिन्नु शरदो अन्ति देवा यत्रा नश्चक्रा जरसं तनूनाम्।  

पुत्रासो यत्र पितरो भवन्ति मानो मध्या रीरिषतायुर्गन्तो:॥

अदितिर्द्यौरदितिरन्तरिक्ष्मदितिर्माता स पिता स पुत्र:।  

विश्वेदेवा अदिति: पञ्चजना अदितिर्जातमदितिर्जनित्वम्॥ 

द्यौ: शान्तिरन्तरिक्ष् ग्वंग शान्ति: पृथिवी शान्ति राप: शान्ति रोषधय: शान्ति:।  

वनस्पतय: शान्तिर्विश्वे देवा: शान्तिर्ब्रह्म शान्ति: सर्व ग्वंग शान्ति: शान्तिरेव शान्ति: सामा शान्तिरेधि॥ 

यतो यत: समीहसे ततो नो अभयं कुरु। शं न: कुरु प्रजाभ्यो भयं न: पशुभ्य:॥

सुशान्तिर्भवतु।

श्री मन्महागणाधिपतये नमः। लक्ष्मीनारायणाभ्यां नम:। उमामहेश्वराभ्यां नम:। 

वाणीहिरण्यगर्भाभ्यां नं:। शचिपुरन्दराभ्यां नम:। इष्टदेवताभ्यो नम:। कुलदेवताभ्यो नम:।ग्रामदेवताभ्यो नम:। वास्तुदेवताभ्यो नम:। स्थानदेवताभ्यो नम:। सर्वेभ्यो देवेभ्यो नम:।सर्वेभ्यो ब्राह्मणेभ्यो नम:। ॐ सिद्धिबुद्धिसहिताय श्री मन्महागणाधिपतये नम:

स्वस्ति वाच

कोई भी शुभ कार्य प्रारम्भ करते समय मंगल कामना की जाती है, जिसके हेतु गणपति महाराज और माँ भगवती-अम्बिका का ध्यान किया जाता है। 

स्वस्तिक मंत्र शुभ और शांति के लिए प्रयुक्त होता है। स्वस्ति = सु + अस्ति = कल्याण हो। इससे हृदय और मन मिल जाते हैं। मंत्रोच्चार करते हुए दर्भ से जल के छींटे डाले जाते हैं. यह माना जाता है कि यह जल पारस्परिक क्रोध और वैमनस्य को शांत कर रहा है। स्वस्ति मन्त्र का पाठ करने की क्रिया ‘स्वस्तिवाचन’ कहलाती है।

ॐ स्वस्ति न इन्द्रो वृद्धश्रवाः। स्वस्ति नः पूषा विश्ववेदाः।

स्वस्ति नस्तार्क्ष्यो अरिष्टनेमिः। स्वस्ति नो बृहस्पतिर्दधातु॥

ॐ शान्तिः शान्तिः शान्तिः॥
गृहनिर्माण के समय स्वस्तिक मंत्र बोला जाता है। मकान की नींव में घी और दुग्ध छिड़का जाता था। ऐसा विश्वास है कि इससे गृहस्वामी को दुधारु गाएँ प्राप्त हेती हैं एवं गृहपत्नी वीर पुत्र उत्पन्न करती है। खेत में बीज डालते समय प्रार्थना की जाती है  कि विद्युत् इस अन्न को क्षति न पहुँचाए, अन्न की विपुल उन्नति हो और फसल को कोई कीड़ा न लगे। पशुओं की समृद्धि के लिए भी स्वस्तिक मंत्र का प्रयोग होता है जिससे उनमें कोई रोग ना लगे। गायों को खूब बच्चे उत्पन्न करें। 

यात्रा के आरंभ में स्वस्तिक मंत्र बोला जाता है ताकि यात्रा सफल और सुरक्षित हो, मार्ग में हिंसक पशु या चोर और डाकू ना मिलें। व्यापार में लाभ हो। अच्छे मौसम के लिए भी इस मन्त्र का जाप किया जाता है, जिससे दिन और रात्रि सुखद हों, स्वास्थ्य लाभ हो तथा खेती को कोई हानि न हो।

पुत्रजन्म पर स्वस्तिक मंत्र अत्यावश्यक है। इससे बच्चा स्वस्थ रहता है, उसकी आयु बढ़ती थी और उसमें शुभ गुणों का समावेश होता है। इसके अलावा भूत, पिशाच तथा रोग उसके पास नहीं आ सकते थे। षोडश संस्कारों में भी इस मंत्र का उपयोग किया जाता है। स्वस्तिक मंत्र शरीर रक्षा, सुखप्राप्ति एवं आयुवृद्धि के लिए प्रयुक्त होता है। 

स्वस्तिवाचन :: यजमान हाथ में पुष्प लेकर गणेश जी महाराज और माँ अम्बिका का ध्यान करें करते हुए निम्न मन्त्रों का पाठ-उच्चारण करें  :- 

सुमुखश्चैकदन्तश्च कपिलो गजकर्णकः। लम्बोदरश्च विकटो विघ्ननाशो विनायक:॥ 

धूम्रकेतुर्गणाध्यक्षो भालचन्द्रो गजानन:। द्वद्शैतानि नामानि यः पठे च्छ्रिणुयादपी॥ 

विद्यारंभे विवाहे च प्रवेशे निर्गमे तथा। संग्रामे संकटे चैव विघ्नस्तस्य न जायते॥ 

शुक्लाम्बरधरं देवं शशिवर्णं चतुर्भुजम्। प्रसन्नवदनं ध्यायेत्  सर्व्विघ्नोपशान्तये॥ 

अभिप्सितार्थ सिद्ध्यर्थं पूजितो य: सुरासुरै:। सर्वविघ्नहरस्तस्मै गणाधिपतये नम:॥ 

सर्वमङ्गलमाङ्गल्ये शिवे सर्वार्थसाधिके। शरण्ये त्र्यम्बिके गौरी नारायणि नमोस्तुते॥ 

सर्वदा सर्वकार्येषु नास्ति तेषाममङ्गलम्। येषां हृदयस्थो भगवान् मङ्गलायतनो हरि:॥ 

तदेव लग्नं सुदिनं तदेव  ताराबलं चन्द्रबलं तदेव। 

विद्याबलं दैवबलं तदेव लक्ष्मीपते तेन्घ्रियुगं स्मरामि॥ 

लाभस्तेषां जयस्तेषां कुतस्तेषां पराजय:। येषामिन्दीवरश्यामो हृदयस्थो जनार्दन:॥ 

यत्र योगेश्वर: कृष्णो यत्र पार्थो धनुर्धर:। तत्र श्रीर्विजयो भूतिर्ध्रुवा नीतिर्मतिर्मम॥ 

अनन्यास्चिन्तयन्तो मां ये जना: पर्युपासते। 

तेषां नित्याभियुक्तानां योगक्षेमं वहाम्यहम्॥ 

स्मृतेःसकल कल्याणं भाजनं यत्र जायते। पुरुषं तमजं नित्यं व्रजामि शरणं हरम्॥ 

सर्वेष्वारंभ कार्येषु त्रय:स्त्री भुवनेश्वरा:। देवा दिशन्तु नः सिद्धिं ब्रह्मेशानजनार्दना:॥ 

विश्वेशम् माधवं दुन्धिं दण्डपाणिं च भैरवम्। 

वन्दे कशी गुहां गंगा भवानीं मणिकर्णिकाम्॥ 

वक्रतुण्ड् महाकाय सूर्य कोटि समप्रभ। निर्विघ्नं कुरु में देव सर्वकार्येषु सर्वदा॥ 

ॐ श्री गणेशाम्बिका भ्यां नम:। 

हाथ में लिया हुआ पुष्प गणेश जी महाराज माँ अम्बिका की मूर्ति या सुपारी से बनाए हुए भगवान् पर चढ़ा दें। इसके पश्चात दाँये हाथ में पुष्प, कुश, तिल, जौ, जल, द्रव्य  लेकर संकल्प करना चाहिए।  

आ नो भद्राः क्रतवो यन्तु विश्वतोऽदब्धासो अपरीतास उद्भिदः।  

देवा नोयथा सदमिद् वृधे असन्नप्रायुवो रक्षितारो दिवेदिवे॥1॥

हमारे पास चारों ओर से ऐंसे कल्याणकारी विचार आते रहें जो किसी से न दबें, उन्हें कहीं से बाधित न किया जा सके एवं अज्ञात विषयों को प्रकट करने वाले हों। प्रगति को न रोकने वाले और सदैव रक्षा में तत्पर देवता प्रतिदिन हमारी वृद्धि के लिए तत्पर रहें। 

देवानां भद्रा सुमतिर्ऋजूयतां देवानां रातिरभि नो नि वर्तताम्।  

देवानां सख्यमुप सेदिमा वयं देवा न आयुः प्र तिरन्तु जीवसे॥2॥

यजमान की इच्छा रखने वाले देवताओं की कल्याण कारिणी श्रेष्ठ बुद्धि सदा हमारे सम्मुख रहे, देवताओं का दान हमें प्राप्त हो, हम देवताओं की मित्रता प्राप्त करें, देवता हमारी आयु को जीने के निमित्त बढ़ायें।

तान् पूर्वयानिविदाहूमहे वयंभगं मित्रमदितिं दक्षमस्रिधम्।

अर्यमणंवरुणंसोममश्विना सरस्वती नः सुभगा मयस्करत्॥3॥

हम वेदरुप सनातन वाणी के द्वारा अच्युतरुप भग, मित्र, अदिति, प्रजापति, अर्यमण, वरुण, चन्द्रमा और अश्विनी कुमारों का आवाहन करते हैं। ऐश्वर्यमयी सरस्वती महावाणी हमें सब प्रकार का सुख प्रदान करें।

 तन्नो वातो मयोभु वातु भेषजं तन्माता पृथिवी तत् पिता द्यौः।  

तद् ग्रावाणः सोमसुतो मयोभुवस्तदश्विना शृणुतं धिष्ण्या युवम्॥4॥

वायुदेवता हमें सुखकारी औषधियाँ प्राप्त करायें। माता पृथ्वी और पिता स्वर्ग भी हमें सुखकारी औषधियाँ प्रदान करें। सोम का अभिषव करने वाले सुखदाता ग्रावा उस औषधरुप अदृष्ट को प्रकट करें। हे अश्विनी-कुमारो! आप दोनों सबके आधार हैं, हमारी प्रार्थना सुनिये।

तमीशानं जगतस्तस्थुषस्पतिं धियंजिन्वमवसे हूमहे वयम्। 

पूषा नो यथा वेदसामसद् वृधे रक्षिता पायुरदब्धः स्वस्तये॥5॥

हम स्थावर-जंगम के स्वामी, बुद्धि को सन्तोष देनेवाले रुद्रदेवता का रक्षा के निमित्त आवाहन करते हैं। वैदिक ज्ञान एवं धन की रक्षा करने वाले, पुत्र आदि के पालक, अविनाशी पुष्टि-कर्ता देवता हमारी वृद्धि और कल्याण के निमित्त हों।

स्वस्ति न इन्द्रो वृद्धश्रवाः स्वस्ति नः पूषा विश्ववेदाः। 

स्वस्ति नस्तार्क्ष्यो अरिष्टनेमिः स्वस्ति नो बृहस्पतिर्दधातु॥6॥

महती कीर्ति वाले ऐश्वर्यशाली इन्द्र हमारा कल्याण करें, जिसको संसार का विज्ञान और जिसका सब पदार्थों में स्मरण है, सबके पोषणकर्ता वे पूषा (सूर्य) हमारा कल्याण करें। जिनकी चक्रधारा के समान गति को कोई रोक नहीं सकता, वे गरुड़देव हमारा कल्याण करें। वेदवाणी के स्वामी बृहस्पति हमारा कल्याण करें।

पृषदश्वा मरुतः पृश्निमातरः शुभंयावानो विदथेषु जग्मयः।

अग्निजिह्वा मनवः सूरचक्षसो विश्वे नो देवा अवसा गमन्निह॥7॥

चितकबरे वर्ण के घोड़ों वाले, अदिति माता से उत्पन्न, सबका कल्याण करने वाले, यज्ञशालाओं में जाने वाले, अग्निरुपी जिह्वा वाले, सर्वज्ञ, सूर्यरुप नेत्र वाले मरुद्गण और विश्वेदेव देवता हविरुप अन्न को ग्रहण करने के लिये हमारे इस यज्ञ में आयें।

भद्रं कर्णेभिः शृणुयाम देवा भद्रं पश्येमाक्षभिर्यजत्राः।

स्थिरैरंगैस्तुष्टुवांसस्तनूभिर्व्यशेम देवहितं यदायुः॥8॥

 हे यजमान के रक्षक देवतागण! हम दृढ अंगों वाले शरीर से पुत्र आदि के साथ मिलकर आपकी स्तुति करते हुए कानों से कल्याण की बातें सुनें, नेत्रों से कल्याणमयी वस्तुओं को देखें, देवताओं की उपासना-योग्य आयु को प्राप्त करें। 

शतमिन्नु शरदो अन्ति देवा यत्रा नश्चक्रा जरसं तनूनाम।

पुत्रासो यत्र पितरो भवन्ति मा नो मध्या रीरिषतायुर्गन्तोः॥9॥

हे देवता गण! आप सौ वर्ष की आयु-पर्यन्त हमारे समीप रहें, जिस आयु में हमारे शरीर को जरावस्था प्राप्त हो, जिस आयु में हमारे पुत्र पिता अर्थात् पुत्रवान् बन जाएँ, हमारी उस गमनशील आयु को आपलोग बीच में खण्डित न होने दें।

अदितिर्द्यौरदितिरन्तरिक्षमदितिर्माता स पिता स पुत्रः।

विश्वेदेवा अदितिः पंचजना अदितिर्जातमदितिर्जनित्वम॥10॥

अखण्डित पराशक्ति स्वर्ग है, वही अन्तरिक्ष-रुप है, वही पराशक्ति माता-पिता और पुत्र भी है। समस्त देवता पराशक्ति के ही स्वरुप हैं, अन्त्यज सहित चारों वर्णों के सभी मनुष्य पराशक्तिमय हैं, जो उत्पन्न हो चुका है और जो उत्पन्न होगा, सब पराशक्ति के ही स्वरुप हैं।

ॐ द्यौ: शान्तिरन्तरिक्षँ शान्ति:, पृथ्वी शान्तिराप: शान्तिरोषधय: शान्ति:। 

वनस्पतय: शान्तिर्विश्वे देवा: शान्तिर्ब्रह्म शान्ति:, सर्वँ शान्ति:, शान्तिरेव शान्ति:, सा मा शान्तिरेधि॥11॥ ॐ शान्ति: शान्ति: शान्ति:॥

द्युलोक शान्तिदायक हों, अन्तरिक्ष लोक शान्तिदायक हों, पृथ्वी लोक शान्तिदायक हो। जल, औषधियाँ और वनस्पतियाँ शान्तिदायक हों। सभी देवता, सृष्टि की सभी शक्तियाँ शान्तिदायक हों। ब्रह्म अर्थात महान परमेश्वर हमें शान्ति प्रदान करने वाले हों। उनका दिया हुआ ज्ञान, वेद शान्ति देने वाले हों। सम्पूर्ण चराचर जगत शान्ति पूर्ण हों अर्थात सब जगह शान्ति ही शान्ति हो। ऐसी शान्ति मुझे प्राप्त हो और वह सदा बढ़ती ही रहे। अभिप्राय यह है कि सृष्टि का कण-कण हमें शान्ति प्रदान करने वाला हो। समस्त पर्यावरण ही सुखद व शान्तिप्रद हो।

शान्ति पाठ :: किसी भी प्रकार के शुभ कार्य को करते हुए शान्ति पाठ अवश्य करें :-

ॐ आनोभद्रा: क्रतवो यन्तु विस्वतो दब्धासो अपरीतास उद्भिद:। 

देवानो यथा सदमिद वृधे असन्नप्रायुवो रक्षितारो दिवे दिवे॥  

देवानां भद्रा सुमतिर्रिजुयताम देवाना ग्वंग रातिरभि नो निवार्ताताम।

देवानां ग्वंग सख्यमुपसेदिमा वयम देवान आयु: प्रतिरन्तु जीवसे॥  

तान पूर्वया निविदा हूमहे वयम भगं मित्र मदितिम दक्षमस्रिधम। 

अर्यमणं वरुण ग्वंग सोममस्विना सरस्वती न: सुभगा मयस्करत॥ 

तन्नोवातो मयोभूवातु भेषजं तन्नमाता पृथिवी तत्पिता द्यौ:।   

तद्ग्रावान: सोमसुतो मयोभूवस्तदस्विना श्रुनुतं धिष्ण्या युवं॥ 

तमीशानं जगतस्तस्थुखसपतिं धियंजिन्वमवसे हूमहे वयम। 

पूषा नो यथा वेद सामसद वृधे रक्षिता पायुरदब्ध: स्वस्तये॥  

स्वस्ति न इन्द्रो वृद्ध श्रवा: स्वस्ति न पूषा विस्ववेदा:। 

स्वस्ति नस्तार्क्ष्यो अरिष्टनेमि: स्वस्ति नो वृहस्पति दधातु॥  

पृषदश्वा मरुत: प्रिश्निमातर: शुभं यावानो विदथेषु जग्मय:। 

अग्निजिह्वा मनव: सूरचक्षसो विश्वे नो देवा अवसागमन्निह॥  

भद्रं कर्णेभि: शृणुयाम देवा भद्रं पश्येमाक्षभिर्यजत्राः।  

स्थिरैरङ्गैस्तुष्टुवा ग्वंग  सस्तनूभिर्व्यशेमहि देवहितं यदायु:॥

शतमिन्नु शरदो अन्ति देवा यत्रा नश्चक्रा जरसं तनूनाम्।  

पुत्रासो यत्र पितरो भवन्ति मानो मध्या रीरिषतायुर्गन्तो:॥

अदितिर्द्यौरदितिरन्तरिक्ष्मदितिर्माता स पिता स पुत्र:।  

विश्वेदेवा अदिति: पञ्चजना अदितिर्जातमदितिर्जनित्वम्॥ 

द्यौ: शान्तिरन्तरिक्ष् ग्वंग शान्ति: पृथिवी शान्ति राप: शान्ति रोषधय: शान्ति:।  

वनस्पतय: शान्तिर्विश्वे देवा: शान्तिर्ब्रह्म शान्ति: सर्व ग्वंग शान्ति: शान्तिरेव शान्ति: सामा शान्तिरेधि॥ 

यतो यत: समीहसे ततो नो अभयं कुरु। शं न: कुरु प्रजाभ्यो भयं न: पशुभ्य:॥

सुशान्तिर्भवतु।

श्री मन्महागणाधिपतये नमः। लक्ष्मीनारायणाभ्यां नम:। उमामहेश्वराभ्यां नम:। 

वाणीहिरण्यगर्भाभ्यां नं:। शचिपुरन्दराभ्यां नम:। इष्टदेवताभ्यो नम:। कुलदेवताभ्यो नम:।ग्रामदेवताभ्यो नम:। वास्तुदेवताभ्यो नम:। स्थानदेवताभ्यो नम:। सर्वेभ्यो देवेभ्यो नम:।सर्वेभ्यो ब्राह्मणेभ्यो नम:। ॐ सिद्धिबुद्धिसहिताय श्री मन्महागणाधिपतये नम:

शिव चालीसा

जय गणेश गिरिजा सुवन, मंगल मूल सुजान।
कहत अयोध्यादास तुम, देहु अभय वरदान ।।
जय गिरिजा पति दीन दयाला ।
सदा करत सन्तन प्रतिपाला ।।
भाल चन्द्रमा सोहत नीके ।
कानन कुण्डल नागफनी के ॥
अंग गौर शिर गंग बहाये ।
मुण्डमाल तन क्षार लगाए ॥
वस्त्र खाल बाघम्बर सोहे ।
छवि को देखि नाग मन मोहे ॥
मैना मातु की हवे दुलारी ।
बाम अंग सोहत छवि न्यारी ॥
कर त्रिशूल सोहत छवि भारी ।
करत सदा शत्रुन क्षयकारी ॥
नन्दि गणेश सोहै तहँ कैसे ।
सागर मध्य कमल हैं जैसे ॥
कार्तिक श्याम और गणराऊ ।
या छवि को कहि जात न काऊ ॥
देवन जबहीं जाय पुकारा ।
तब ही दुख प्रभु आप निवारा ॥
किया उपद्रव तारक भारी ।
देवन सब मिलि तुमहिं जुहारी ॥
तुरत षडानन आप पठायउ ।
लवनिमेष महँ मारि गिरायउ ॥
आप जलंधर असुर संहारा ।
सुयश तुम्हार विदित संसारा ॥
त्रिपुरासुर सन युद्ध मचाई ।
सबहिं कृपा कर लीन बचाई ॥
किया तपहिं भागीरथ भारी ।
पुरब प्रतिज्ञा तासु पुरारी ॥
दानिन महँ तुम सम कोउ नाहीं ।
सेवक स्तुति करत सदाहीं ॥
वेद नाम महिमा तव गाई।
अकथ अनादि भेद नहिं पाई ॥
प्रकटी उदधि मंथन में ज्वाला ।
जरत सुरासुर भए विहाला ॥
कीन्ही दया तहं करी सहाई ।
नीलकण्ठ तब नाम कहाई ॥
पूजन रामचन्द्र जब कीन्हा ।
जीत के लंक विभीषण दीन्हा ॥
सहस कमल में हो रहे धारी ।
कीन्ह परीक्षा तबहिं पुरारी ॥
एक कमल प्रभु राखेउ जोई ।
कमल नयन पूजन चहं सोई ॥
कठिन भक्ति देखी प्रभु शंकर ।
भए प्रसन्न दिए इच्छित वर ॥
जय जय जय अनन्त अविनाशी ।
करत कृपा सब के घटवासी ॥
दुष्ट सकल नित मोहि सतावै ।
भ्रमत रहौं मोहि चैन न आवै ॥
त्राहि त्राहि मैं नाथ पुकारो ।
येहि अवसर मोहि आन उबारो ॥
लै त्रिशूल शत्रुन को मारो ।
संकट से मोहि आन उबारो ॥
मात-पिता भ्राता सब होई ।
संकट में पूछत नहिं कोई ॥
स्वामी एक है आस तुम्हारी ।
आय हरहु मम संकट भारी ॥
धन निर्धन को देत सदा हीं ।
जो कोई जांचे सो फल पाहीं ॥
अस्तुति केहि विधि करैं तुम्हारी ।
क्षमहु नाथ अब चूक हमारी ॥
शंकर हो संकट के नाशन ।
मंगल कारण विघ्न विनाशन ॥
योगी यति मुनि ध्यान लगावैं ।
शारद नारद शीश नवावैं ॥
नमो नमो जय नमः शिवाय ।
सुर ब्रह्मादिक पार न पाय ॥
जो यह पाठ करे मन लाई ।
ता पर होत है शम्भु सहाई ॥
ॠनियां जो कोई हो अधिकारी ।
पाठ करे सो पावन हारी ॥
पुत्र हीन कर इच्छा जोई ।
निश्चय शिव प्रसाद तेहि होई ॥
पण्डित त्रयोदशी को लावे ।
ध्यान पूर्वक होम करावे ॥
त्रयोदशी व्रत करै हमेशा ।
ताके तन नहीं रहै कलेशा ॥
धूप दीप नैवेद्य चढ़ावे ।
शंकर सम्मुख पाठ सुनावे ॥
जन्म जन्म के पाप नसावे ।
अन्त धाम शिवपुर में पावे ॥
कहैं अयोध्यादास आस तुम्हारी ।
जानि सकल दुःख हरहु हमारी ॥

||दोहा||

नित्त नेम कर प्रातः ही,पाठ करौं चालीसा ।
तुम मेरी मनोकामना,पूर्ण करो जगदीश ॥
मगसर छठि हेमन्त ॠतु,संवत चौसठ जान ।
अस्तुति चालीसा शिवहि,पूर्ण कीन कल्याण ॥

श्री शिव चालीसा – 2
अज अनादि अविगत अलख, अकल अतुल अविकार।
बंदौं शिव-पद-युग-कमल अमल अतीव उदार॥
आर्तिहरण सुखकरण शुभ भक्ति -मुक्ति -दातार।
करौ अनुग्रह दीन लखि अपनो विरद विचार॥

पर्यो पतित भवकूप महँ सहज नरक आगार।
सहज सुहृद पावन-पतित, सहजहि लेहु उबार॥

पलक-पलक आशा भर्यो, रह्यो सुबाट निहार।
ढरौ तुरन्त स्वभाववश, नेक न करौ अबार॥

जय शिव शङ्कर औढरदानी।
जय गिरितनया मातु भवानी॥

सर्वोत्तम योगी योगेश्वर।
सर्वलोक-ईश्वर-परमेश्वर॥

सब उर प्रेरक सर्वनियन्ता।
उपद्रष्टा भर्ता अनुमन्ता॥

पराशक्ति – पति अखिल विश्वपति।
परब्रह्म परधाम परमगति॥

सर्वातीत अनन्य सर्वगत।
निजस्वरूप महिमामें स्थितरत॥

अंगभूति – भूषित श्मशानचर।
भुजंगभूषण चन्द्रमुकुटधर॥
वृषवाहन नंदीगणनायक।
अखिल विश्व के भाग्य-विधायक॥

व्याघ्रचर्म परिधान मनोहर।
रीछचर्म ओढे गिरिजावर॥

कर त्रिशूल डमरूवर राजत।
अभय वरद मुद्रा शुभ साजत॥

तनु कर्पूर-गोर उज्ज्वलतम।
पिंगल जटाजूट सिर उत्तम॥

भाल त्रिपुण्ड्र मुण्डमालाधर।
गल रुद्राक्ष-माल शोभाकर॥

विधि-हरि-रुद्र त्रिविध वपुधारी।
बने सृजन-पालन-लयकारी॥

तुम हो नित्य दया के सागर।
आशुतोष आनन्द-उजागर॥

अति दयालु भोले भण्डारी।
अग-जग सबके मंगलकारी॥

सती-पार्वती के प्राणेश्वर।
स्कन्द-गणेश-जनक शिव सुखकर॥

हरि-हर एक रूप गुणशीला।
करत स्वामि-सेवक की लीला॥

रहते दोउ पूजत पुजवावत।
पूजा-पद्धति सबन्हि सिखावत॥

मारुति बन हरि-सेवा कीन्ही।
रामेश्वर बन सेवा लीन्ही॥

जग-जित घोर हलाहल पीकर।
बने सदाशिव नीलकंठ वर॥

असुरासुर शुचि वरद शुभंकर।
असुरनिहन्ता प्रभु प्रलयंकर॥

नम: शिवाय मन्त्र जपत मिटत सब क्लेश भयंकर॥

जो नर-नारि रटत शिव-शिव नित।
तिनको शिव अति करत परमहित॥

श्रीकृष्ण तप कीन्हों भारी।
ह्वै प्रसन्न वर दियो पुरारी॥

अर्जुन संग लडे किरात बन।
दियो पाशुपत-अस्त्र मुदित मन॥

भक्तन के सब कष्ट निवारे।
दे निज भक्ति सबन्हि उद्धारे॥

शङ्खचूड जालन्धर मारे।
दैत्य असंख्य प्राण हर तारे॥

अन्धकको गणपति पद दीन्हों।
शुक्र शुक्रपथ बाहर कीन्हों॥

तेहि सजीवनि विद्या दीन्हीं।
बाणासुर गणपति-गति कीन्हीं॥

अष्टमूर्ति पंचानन चिन्मय।
द्वादश ज्योतिर्लिङ्ग ज्योतिर्मय॥

भुवन चतुर्दश व्यापक रूपा।
अकथ अचिन्त्य असीम अनूपा॥

काशी मरत जंतु अवलोकी।
देत मुक्ति -पद करत अशोकी॥

भक्त भगीरथ की रुचि राखी।
जटा बसी गंगा सुर साखी॥

रुरु अगस्त्य उपमन्यू ज्ञानी।
ऋषि दधीचि आदिक विज्ञानी॥

शिवरहस्य शिवज्ञान प्रचारक।
शिवहिं परम प्रिय लोकोद्धारक॥

इनके शुभ सुमिरनतें शंकर।
देत मुदित ह्वै अति दुर्लभ वर॥

अति उदार करुणावरुणालय।
हरण दैन्य-दारिद्रय-दु:ख-भय॥

तुम्हरो भजन परम हितकारी।
विप्र शूद्र सब ही अधिकारी॥

बालक वृद्ध नारि-नर ध्यावहिं।
ते अलभ्य शिवपद को पावहिं॥

भेदशून्य तुम सबके स्वामी।
सहज सुहृद सेवक अनुगामी॥

जो जन शरण तुम्हारी आवत।
सकल दुरित तत्काल नशावत॥

|| दोहा ||

बहन करौ तुम शीलवश, निज जनकौ सब भार।
गनौ न अघ, अघ-जाति कछु, सब विधि करो सँभार

तुम्हरो शील स्वभाव लखि, जो न शरण तव होय।
तेहि सम कुटिल कुबुद्धि जन, नहिं कुभाग्य जन कोय

दीन-हीन अति मलिन मति, मैं अघ-ओघ अपार।
कृपा-अनल प्रगटौ तुरत, करो पाप सब छार॥

Check out this post… “लिंगाष्टक स्तोत्र”.

ब़ह्मामुरारिसुरार्चितलिंग निर्मलभासित शोभितलिंगम ।
जन्मजदु:खविनाशकलिंगं तत्प्रणमामि सदाशिवलिंगम ।।1।।

देवमुनिप्रवरार्चितलिंगं कामदहं करुणाकरलिंगम ।
रावणदर्पविनाशन लिंगं तत्प्रणमामि सदाशिवलिंगम ।।2।।

सर्वसुगंधिसुलेपित लिंगं बुद्धि विवर्धनकारणलिंगम ।
सिद्धसुरासुरवंदितलिंगं तत्प्रणमामि सदाशिव लिंगम ।।3।।

कनकमहामणिभूषितलिंगं फणिपति वेष्टित शोभितलिंगम ।
दक्षसुयज्ञविनाशकलिंगं तत्प्रणमामि सदाशिव लिंगम ।।4।।

कुंकुमचन्दनलेपितलिंगंं पंकजहारसुशोभितलिंगम ।
संचितपापविनाशनलिंगं तत्प्रणमामि सदा शिवलिंगम ।।5।।

देवगणार्चितसेवितलिंगं भावैर्भक्तिभिरेव च लिंगम ।
दिनकरकोटिप्रभाकर लिंगम पत्प्रणमामि सदाशिवलिंगम ।।6।।

अष्टदलोपरिवेष्टितलिंगम सर्वसमुद्भवकारणलिंगम ।
अष्टदरिद्र विनाशितलिंगम तत्प्रणमामि सदाशिवलिंगम ।।7।।

सुरगुरुसुरवरपूजितलिंगम सुरवनपुष्प सदार्चितलिंगम ।
परात्परपरमात्मकलिंगम तत्प्रणमामि सदाशिवलिंगम ।।8।।

लिंगाष्टकमिदं पुण्यं य: पठेच्छिवसन्निधौ ।
शिवलोकमवाप्नोति शिवेन सह मोदते ।।9।।

सर्वारिष्ट निवारण स्तोत्र

(इस स्तोत्र को श्रद्धापूर्वक करने से सभी अरिष्टों का नाश होता है। अधिक लाभ के लिए इस स्तोत्र से नित्य हवन करें तथा ‘स्वाहा’ के उच्चारण के साथ गाय के घी की आहुति छोड़ें।)

सर्वारिष्ट निवारण स्तोत्र पाठ
ॐ गं गणपतये नम:।

सर्वविघ्न विनाशनाय, सर्वारिष्ट निवारणाय,

सर्वसौख्यप्रदाय, बालानां बुद्धिप्रदाय, नानाप्रकार

धन वाहन भूमि प्रदाय, मनोवांछित फलप्रदाय

रक्षां कुरु कुरु स्वाहा।

ॐ गुरवे नम:, ॐ श्रीकृष्णाय नम:, ॐ बलभद्राय नम:,

ॐ श्रीरामाय नम:, ॐ हनुमते नम:, ॐ शिवाय नम:,

ॐ जगन्नाथाय नम:, ॐ बदरीनारायणाय नम:,

ॐ श्री दुर्गादेव्यै नम:।।

ॐ सूर्याय नम:, ॐ चन्द्राय नम:, ॐ भौमाय नम:,

ॐ बुधाय नम:, ॐ गुरवे नम:, ॐ भृगवे नम:,

ॐ शनिश्चराय नम:, ॐ राहवे नम:,

ॐ पुच्छानयकाय नम:,

ॐ नवग्रह रक्षा कुरु कुरु नम:।।

ॐ मन्येवरं हरिहरादय एव दृष्टा द्रष्टेषु येषु

हृदयस्थं त्वयं तोषमेति विविक्षते न भवता भुवि

येन नान्य कश्चिन्मनो हरति नाथ भवान्तरेऽपि।

ॐ नमो मणिभद्रे। जयविजयपराजिते।

भद्रे लभ्यं कुरु कुरु स्वाहा।।

ॐ भूर्भुव: स्व: तत्सवितुर्वरेण्यं भर्गो देवस्य धीमहि

धियो योन: प्रचोदयात्।

सर्व विघ्नं शान्तं कुरु कुरु स्वाहा।।

ॐ ऐं हृीं क्लीं श्रीबटुकभैरवाय आपदुद्धारणाय

महानश्यामस्वरूपाय दीर्घारिष्ट विनाशाय नाना-

प्रकार भोगप्रदाय मम (यजमानस्य वा) सर्वारिष्टं

हन् हन्, पच पच, हर हर, कच कच, राज द्वारे

जयं कुरु कुरु, व्यवहारे लाभं वृद्धिं वृद्धिं,

रणे शत्रून विनाशय विनाशय, पूर्णां आयु: कुरु कुरु

स्त्री-प्राप्तिं कुरु कुरु, हुम् फट् स्वाहा।।

ॐ नमो भगवते वासुदेवाय नम:।

ॐ नमो भगवते, विश्व मूर्तये, नाराणाय, श्री पुरुषोत्तमाय।

रक्ष रक्ष युग्मदधिकं प्रत्यक्षं परोक्षं वा अजीर्ण

पच पच, विश्वमूर्तिकान् हन् हन्, ऐकाह्निकं

द्वाह्निकं त्राह्निकं चतुरह्निकं जवरं नाशय नाशय,

चतुरग्निवातान् अष्टादशक्षयान् रोगान्,

अष्टादशकुष्ठान् हन् हन्, सर्वदोषं भंजय-भन्जय,

तत् सर्व नाशय-नाशय, शोषय-शोषय,

आकर्षय-आकर्षय, मम शत्रुं मारय-मारय,

उच्चाटय-उच्चाटय, विद्वेषय-विद्वेषय, स्तंभय-स्तंभय,

निवारय-निवारय, विघ्नं हन् हन्,

दह-दह, पच-पच, मथ-मथ, विध्वंसय-विध्वंसय,

विद्रावय-विद्रावय, चक्रं गृहीत्वा शीघ्रामागच्छागच्छ,

चक्रेण हन् हन्, परविद्यां छेदय-छेदय,

चौरासी चेटकान् विस्फोटान् नाशय-नाशय,

वात-शुष्क-दृष्टि-सर्प-सिंह-व्याघ्र-द्विपद-चतुष्पद अपरे

बाह्यं ताराभि: भव्यन्तरिक्षं अन्याय-व्यापि-केचिद्

देश-काल स्थान सर्वान् हन् हन्, विद्युन्मेघ नदी-पर्वत,

अष्टव्याधि सर्वस्थानानि, रात्रि-दिनं, चौरान् वशय-वशय,

सर्वोपद्रव-नाशनाय, पर-सैन्यं विदारय-विदारय, पर-चक्रं

निवारय-निवारय, दह-दह, रक्षां कुरु कुरु,

ॐ नमो भगवते, ॐ नमो नारायणाय, हुं फट् स्वाहा।।

ठ: ठ: ॐ हृीं हृीं। ॐ हृीं क्लीं भुवनेश्वर्या: श्रीं ॐ भैरवाय नम:।

हरि ॐ उच्छिष्ट-देव्यै नम:।

डाकिनी-सुमुखी-देव्यै, महापिशाचिनी ॐ ऐं ठ: ठ:।

ॐ चक्रिण्या अहं रक्षां कुरु कुरु, सर्वव्याधिहरणीदेव्यै नमो नम:।

सर्वप्रकारबाधा शमनमरिष्टं निवारणं कुरु कुरु फट्।

श्रीं ॐ कुब्जिका देव्यै हृीं ठ: स्वाहा।।

शीघ्रमरिष्टं निवारणं कुरु कुरु देवी शाम्बरी क्रीं ठ: स्वाहा।

शारिकाभेदा महामाया पूर्णं आयु: कुरु।

हेमवती मूलं रक्षा कुरु।

चामुण्डायै देव्यै शीघ्रं विघ्नं सर्वं वायु कफ पित्त रक्षां कुरु।

मंत्र-तंत्र-कवच ग्रह पीड़ा नडतर,

पूर्व जन्मदोष नडतर, यस्य जन्मदोष नडतर,

मातृदोष नडतर, पितृदोष-पिशाच-जात-जादू-टोना शमनं कुरु।

सन्ति सरस्वत्यै कण्ठिका देव्यै गल-विस्फोटकायै विक्षिप्त

शमनं महान् ज्वर क्षयं कुरु स्वाहा।।

सर्व सामग्री भोगं सप्तदिवसं देहि-देहि रक्षां कुरु,

क्षण-क्षण अरिष्ट निवारणं, दिवस-प्रति-दिवस दु:ख

हरणं मंगलकरणं कार्यसिद्धिं कुरु।

हरि ॐ श्रीरामचन्द्राय नम:,

हरि ॐ भूर्भुव: स्व: चन्द्र

तारा-नवग्रह-शेष-नाग-पृथ्वी देव्यै

आकाशस्य सर्वारिष्ट निवारणं कुरु कुरु स्वाहा।

1. ॐ ऐं हृीं श्रीं बटुकभैरवाय आपदुद्धारणाय सर्वविघ्न निवारणाय मम रक्षां कुरु कुरु स्वाहा।

2. ॐ ऐं हृीं क्लीं श्रीवासुदेवाय नम:, बटुकभैरवाय आपदुद्धारणाय मम रक्षां कुरु कुरु स्वाहा।।

3. ॐ ऐं हृीं क्लीं श्रीविष्णु भगवान मम अपराधक्षमा कुरु कुरु, सर्वविघ्नं विनाशाय मम कामना पूर्णं कुरु कुरु स्वाहा।

4. ॐ ऐं हृीं क्लीं श्रीबटुकभैरवाय आपदुद्धारणाय सर्वविघ्नं निवारणाय मम रक्षां कुरु कुरु स्वाहा।

5. ॐ ऐं हृीं क्लीं श्रीं ॐ श्रीदुर्गादेवी रूद्राणीसहिता, रूद्र देवता कालभैरव सह बटुक भैरवाय, हनुमान सह मकरध्वजाय आपदुद्धारणाय मम सर्वदोष क्षमाय कुरु कुरु सकल विनाशाय मम शुभमांगलिक कार्य सिद्धिं कुरु कुरु स्वाहा।

एष विद्यामाहात्म्यं च पुरा मया प्रोक्तं ध्रुवं।

शतक्रतो तु हन्येतान् सर्वाश्च बलिदानवा:।।

य पुमान् पठते नित्यं एतत् स्तोत्रं नित्यात्मना।

तस्य सर्वान् हि सन्ति, यत्र दृष्टिगतंविषं।।

अन्य दृष्टि-विषं चैव न देयं संक्रमे ध्रुवम्।

संग्रामे धारयेत्यम्बे उत्पाता च विसंशय:।।

सौभाग्यं जायते तस्य, परमं नात्र संशय:।

द्रुतं सद्यं जयस्तस्य विघ्नस्तस्य न जायते।।

किमत्र बहुनोक्तेन सर्वसौभाग्य सम्पदा।

लभतेनात्र सन्देहो नान्यथा वचनं भवेत्।।

ग्रहीतो यदि वा यत्नं बालानां विविधैरपि।

शीतं समुष्णतां याति, उष्ण: शीतमयो भवेत्।।

नान्यथा श्रुतये विद्या पठति कथितं मया।

भोजपत्रे लिखेदृ यंत्रं गोरोचनमयेन च।।

इमां विद्यां शिरो बध्वा, सर्वरक्षाकरोतु मे।

पुरुषस्याथवा नारी, हस्ते बध्वा विचक्षण:।।

विद्रवन्ति प्रणश्यन्ति, धर्मस्तिष्ठति नित्यश:।

सर्वशत्रुरधो यान्ति:, शीघ्रं ते च पलायनम्।।

श्री शनि चालीसा

Shani Chalisa : श्री शनि चालीसा, साढेसाती और शनि दशा में नियमित करें पाठ

दोहा
जय-जय श्री शनिदेव प्रभु, सुनहु विनय महराज।
करहुं कृपा हे रवि तनय, राखहु जन की लाज।।

चौपाई
जयति-जयति शनिदेव दयाला।
करत सदा भक्तन प्रतिपाला।।
चारि भुजा तन श्याम विराजै।
माथे रतन मुकुट छवि छाजै।।
परम विशाल मनोहर भाला।
टेढ़ी दृष्टि भृकुटि विकराला।।
कुण्डल श्रवण चमाचम चमकै।
हिये माल मुक्तन मणि दमकै।।
कर में गदा त्रिशूल कुठारा।
पल विच करैं अरिहिं संहारा।।
पिंगल कृष्णो छाया नन्दन।
यम कोणस्थ रौद्र दुःख भंजन।।
सौरि मन्द शनी दश नामा।
भानु पुत्रा पूजहिं सब कामा।।
जापर प्रभु प्रसन्न हों जाहीं।
रंकहु राउ करें क्षण माहीं।।
पर्वतहूं तृण होई निहारत।
तृणहंू को पर्वत करि डारत।।
राज मिलत बन रामहि दीन्हा।
कैकइहूं की मति हरि लीन्हा।।
बनहूं में मृग कपट दिखाई।
मात जानकी गई चुराई।।
लषणहि शक्ति बिकल करि डारा।
मचि गयो दल में हाहाकारा।।
दियो कीट करि कंचन लंका।
बजि बजरंग वीर को डंका।।
नृप विक्रम पर जब पगु धारा।
चित्रा मयूर निगलि गै हारा।।
हार नौलखा लाग्यो चोरी।
हाथ पैर डरवायो तोरी।।
भारी दशा निकृष्ट दिखाओ।
तेलिहुं घर कोल्हू चलवायौ।।
विनय राग दीपक महं कीन्हो।
तब प्रसन्न प्रभु ह्नै सुख दीन्हों।।
हरिशचन्द्रहुं नृप नारि बिकानी।
आपहुं भरे डोम घर पानी।।
वैसे नल पर दशा सिरानी।
भूंजी मीन कूद गई पानी।।
श्री शकंरहि गहो जब जाई।
पारवती को सती कराई।।
तनि बिलोकत ही करि रीसा।
नभ उड़ि गयो गौरि सुत सीसा।।
पाण्डव पर ह्नै दशा तुम्हारी।
बची द्रोपदी होति उघारी।।
कौरव की भी गति मति मारी।
युद्ध महाभारत करि डारी।।
रवि कहं मुख महं धरि तत्काला।
लेकर कूदि पर्यो पाताला।।
शेष देव लखि विनती लाई।
रवि को मुख ते दियो छुड़ाई।।
वाहन प्रभु के सात सुजाना।
गज दिग्गज गर्दभ मृग स्वाना।।
जम्बुक सिंह आदि नख धारी।
सो फल ज्योतिष कहत पुकारी।।
गज वाहन लक्ष्मी गृह आवैं।
हय ते सुख सम्पत्ति उपजावैं।।
गर्दभहानि करै बहु काजा।
सिंह सिद्धकर राज समाजा।।
जम्बुक बुद्धि नष्ट करि डारै।
मृग दे कष्ट प्राण संहारै।।
जब आवहिं प्रभु स्वान सवारी।
चोरी आदि होय डर भारी।।
तैसहिं चारि चरण यह नामा।
स्वर्ण लोह चांदी अरु ताम्बा।।
लोह चरण पर जब प्रभु आवैं।
धन सम्पत्ति नष्ट करावैं।।
समता ताम्र रजत शुभकारी।
स्वर्ण सर्व सुख मंगल भारी।।
जो यह शनि चरित्रा नित गावै।
कबहुं न दशा निकृष्ट सतावै।।
अद्भुत नाथ दिखावैं लीला।
करैं शत्राु के नशि बल ढीला।।
जो पंडित सुयोग्य बुलवाई।
विधिवत शनि ग्रह शान्ति कराई।।
पीपल जल शनि-दिवस चढ़ावत।
दीप दान दै बहु सुख पावत।।
कहत राम सुन्दर प्रभु दासा।
शनि सुमिरत सुख होत प्रकाशा।।

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